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रामदेव पर बरप रहे शनिदेव

Posted On: 1 Sep, 2011 Others में

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अंततः गत २७ अगस्त को सूर्यास्त के साथ अन्ना हजारे नीत देशव्यापी आन्दोलन का सुफल उदित हुआ। स्वतन्त्रता दिवस के अगले दिन १६ अगस्त से चल रहे अन्ना हजारे के अनशन के सामने भारत की कॉँग्रेस नीत केंद्र सरकार समेत पूरी संसद नतमस्तक हुई और उनके जन लोकपाल बिल पर बहुत हद तक सहमति जता दी। हालाँकि स्पष्टवादी लेकिन विनम्र अन्ना ने इसे आधी जीत ही बताया और अगले दिन २८ अगस्त को सुबह १०:२० बजे अपना १२ दिनी अनशन तोड़कर भारतीय जनता को संबोधित करते हुए घोषणा भी की कि लड़ाई अभी बाकी है। कुल मिलाकर अन्ना के आन्दोलन ने देश को एकजुट कर दिया। एक सही और समयानुरूप माँग को लेकर चलाये जा रहे इस आन्दोलन से जुड़ने में देश के हर आम-ओ-ख़ास ने कोई संकोच या नखरा नहीं किया। क्या युवा, क्या महिलाएँ, क्या वृद्ध और तो और वास्तविकता में कॉँग्रेस की विचारधारा पर कट्टरता से कायम कई कॉँग्रेसियों और गाँधीवादियों ने भी इस आन्दोलन का पुरज़ोर समर्थन किया। हाँ, ‘सोनिया-राहुल कॉँग्रेस’ के अनुयायी ज़रूर लाज़िम तौर पर इस आन्दोलन के ख़िलाफ़ दिखे। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इन सबके बीच एक समूह ऐसा भी दिखा जो स्वयं को कॉँग्रेस विरोधी कहता रहा, और अन्ना का समर्थन कर रहे सभी के सभी लोगों को कॉँग्रेस का समर्थक बताता रहा। ये समूह है कुछ ऐसे विचित्र बुद्धि वाले लोगों का जो अपने को बाबा रामदेव के कट्टर समर्थक और उनके आन्दोलन को ही सच्चा आन्दोलन बताते हैं और उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के ज़रिये और आम जनों के बीच बेशर्मी के साथ यह बयार चलायी कि अन्ना हजारे और उनकी टीम के सदस्य कॉँग्रेस की कठपुतली हैं और बाबा रामदेव के प्रभाव को कम करने के लिए अन्ना के आन्दोलन को कॉँग्रेस ख़ुद ही अंदरखाने बढ़ावा दे रही है। वैसे इसमें इनका दोष नहीं है, असल में ज़रुरत से ज़्यादा बुद्धिमान बनने का दिखावा करने की परिणति यही होती है कि ऐसा व्यक्ति कुछ भी सोचता-बोलता रहता है और इसी तरह हर बात को संदेह की दृष्टि से देखते रहने का नतीजा यही होता है कि उस शख्स को सामान्य स्पष्ट दृष्टव्य में भी कुछ साज़िश की बू आती रहती है. हमारा यह उद्घाटन ब्लॉग रामदेव के ऐसे ही तथाकथित कतिपय समर्थकों को समर्पित है।
कहते हैं, “सत्य और साहस है जिसके मन में, अंत में जीत उसी की होय”। तभी तो अन्ना हजारे का आन्दोलन लगभग सफल हुआ। एक अनशन बाबा रामदेव ने भी किया था करीब ३ महीने पहले, जिसमें बेचारे बाबा जी का जो हश्र हुआ वो सबने देखा। दरअसल इन दिनों बाबा रामदेव के कुछ तथाकथित समर्थक बारम्बार यह हास्यास्पद आरोप लगाने में जुटे हैं कि अन्ना हजारे कॉँग्रेस से मिले हुए हैं और कॉँग्रेस ख़ुद अन्ना हजारे के आन्दोलन का अंदर ही अंदर समर्थन कर रही है, ताकि रामदेव के बढ़ते प्रभाव को कम किया जा सके। अब जबकि अन्ना के आन्दोलन की बावत विभिन्न प्रकार के आकलन व विश्लेषण किये जा रहे हैं तो हमने सोचा कि हम भी अन्ना और बाबा जी के लिए कुछ अन्वेषण कर लें, और करने से जो स्थिति स्पष्ट हुई वो इस प्रकार है- अन्ना के पीछे कॉँग्रेस है या नहीं, ये तो ऊपरवाला जाने, लेकिन रामदेव व कॉँग्रेस के बीच विवाद वैसा ही है जैसा उन दो भाइयों में होता है जो कभी तो एक-दूसरे के लिए जान देने के लिए तत्पर रहते हैं, लेकिन बाद में एक-दूसरे की जान लेने के लिए तैयार हो जाते हैं। काला धन देश में वापस लाने का रामदेव का लक्ष्य (जनता को दिखाने के लिए) तो सही था, लेकिन उनके मन में सियासत करने का कीड़ा दशकों से बड़े भीषण ढंग से कुलबुला रहा था। तभी बीते कुछ वर्षों से योग शिविरों में वो कहा करते थे “अब मैं राजनीति में उतरूंगा, पार्टी बनाऊंगा।” वर्षों पूर्व कॉँग्रेस शासित उत्तराखंड राज्य में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की सहायता से बाबा जी ने हरिद्वार में पैठ बनायी और अपना विश्वविद्यालय शुरू किया। क्यों, अरे नारायण दत्त कॉंग्रेसी हुए तो क्या हुआ, हैं तो बाबा जी के दोस्त, और इन दोनों की गलबहियाँ तो जगजाहिर हैं। फिर बाबा जी ने ४ जून को दिल्ली में अनशन की घोषणा की। जब वो दिल्ली पहुँचे तो बाकायदा तीन केन्द्रीय मंत्री (सब कॉंग्रेसी) उनकी अगवानी करने आये। क्यों, अरे अपना भाई जो आया था। किसी को अनशन पर बैठने के लिए कितनी जगह चाहिये, कमोबेश चंद वर्ग फ़ीट में काम चल जायेगा, लेकिन बाबा जी ने राम लीला मैदान में विशाल पंडाल लगवाया और एक बहुत बड़ा-ऊँचा मंच लगवाया।
इसी दौरान एक बेहतरीन होटल के बंद कमरे में बाबा जी और उनके कॉंग्रेसी बंधुओं के बीच विस्तृत मंत्रणा हुई, जिसके बारे में अंदरखाने से यह बात निकालकर सामने आयी कि बाबा जी की कई बातें मान ली गयीं। लेकिन ये कैसे? बाबा जी ये तो चाहते ही नहीं थे। अगर इतनी आसानी से बात बन जाती तो उनको सरकार और जनता से सामने शक्ति प्रदर्शन का सपना अधूरा न रह जाता! इसी के लिए तो उन्होंने कई किलो मीटर लम्बी यात्राएँ कर अपने अनुयायियों को वहाँ बुलाया था। लिहाज़ा सब दरकिनार कर ४ जून को बाबा जी योग शिविर की आड़ में अनशन पर बैठे। चलो ठीक है, कोई बात नहीं, लेकिन अनशन करना था तो मंच पर अकेले बैठकर करते, लेकिन उन्होंने मंच पर विभिन्न राजनीतिक लोगों को स्थान दिया। दिन भर वहाँ पेट फुला-पिचकाकर विभिन्न करतब दिखाये जाते रहे और साथ ही साथ सरकार के ख़िलाफ़ ज़हर उगला जाता रहा। शाम तक तो बाबा जी ने ख़ुद ही कई-कई बार सरकार को तगड़ी कारवाई करने की चुनौती दी, जो कि उनकी प्लानिंग का हिस्सा थी, क्योंकि इससे उनकी सियासत और चमक जाती। अच्छी या बुरी कैसी भी सरकार हो, सीधी चुनौती कोई नहीं बर्दाश्त करेगी… और तानाशाह सरकार तो तुरंत ही दिमाग दुरुस्त कर देगी, फिर चाहे वो कोई सगा ही क्यों न हो। सरकार ने देखा कि ये तो उसका सगा ही उसके लिए नासूर बना जा रहा है। नतीजतन, जैसे शरीर किसी अंग में गलता लगने पर उसे काटना ही अंतिम उपाय होता है, सरकार ने भी बाबा जी के प्रति अपना प्रेम-स्नेह भुलाकर कड़ा कदम उठाने की ठानी। आधी रात को सरकार ने योग शिविर में हमला करवा दिया। इस वक़्त भी पहले बाबा जी ने फ़िल्मी हीरो की तरह मंच से छलांग लगा दी, लेकिन बाद में रील लाइफ़ और रियल लाइफ़ के बीच अंतर दिखने पर वो स्त्री भेष धरकर भाग निकले। पता नहीं गिरफ़्तार होने और जेल जाने से वह क्यों डर गये? लेकिन उनके पीठ दिखाकर भागने का ख़ामियाज़ा उनके सच्चे वफादार समर्थकों ने भुगता और उनका विश्वास अपने प्रिय बाबा जी पर से डिग गया।
खैर, बाबा जी यहाँ से अगले दिन सुबह ही हरिद्वार पहुँचा दिये गये कॉंग्रेस ने पुराने भ्रातृत्व का कुछ लिहाज़ रखा और उन्हें किसी और राज्य भेजने की बजाय सीधे उनके घर भेजा। यहाँ बाबा जी ने कहा कि उनका अनशन अभी चल रहा है। डूबते को तिनके के सहारे की तरह उनके समर्थकों को कुछ तसल्ली हुई, लेकिन नींबू-शहद के चटखारे लेते रहने के बावजूद ५ दिन में बाबा जी की हिम्मत जवाब दे गयी और उन्हें आइ.सी.यू. में भर्ती कराना पड़ा। हालाँकि वह कहते रहे कि अब माँग पूरे होने तक वो अनशन नहीं तोड़ेंगे, लेकिन अंततोगत्वा आठवें दिन उन्होंने अनशन तोड़ दिया, यह कहकर कि फलाँ जन ने मुझसे कहा तो मैंने अनशन तोड़ा. क्या बाबा जी, एक तो लोगों की उम्मीद पर खरे नहीं उतर सके, फिर स्पष्टीकरण दे रहे हो। इतिहास और वर्तमान गवाह हैं कि सामान्य जन भी कई-कई दिन लम्बे अनशन कर चुके हैं, लेकिन एक योगाचार्य एकदम ही गये-बीते निकले। इसीलिए लोगों का उन पर से विश्वास लगभग हट गया है, जिसे भाँपकर उन्होंने फिर से यात्राएँ करने की ठानी है, ताकि लोगों को सफाई दे सकें और आगे की सियासी चाल के लिए उन्हें फिर से जोड़ सकें। दरअसल बाबा जी तो भारत का प्रधान मंत्री बनने का ख़्वाब देख रहे थे, इसका एक सबूत है बाबा जी की प्रमुख माँगों में से एक माँग कि देश में प्रधान मंत्री का चुनाव सीधे जनता करे। बाबा जी के चतुर मष्तिष्क में पूरी प्लानिंग थी कि वो इस तरह सरकार और जनता के सामने शक्ति प्रदर्शन करेंगे, जिससे सरकार डरकर उनकी सारी माँगें मान लेगी और इस तरह वो भारतवासियों को प्रभावित कर लेंगे। फिर अपने पूर्वघोषणा के अनुसार वो अपनी राजनीतिक पार्टी का गठन करेंगे और लोक सभा चुनाव में ख़ुद या किसी दूसरे से ख़ुद को प्रस्तावित कराकर जनता के सामने प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में सामने आयेंगे। लेकिन, (हाय री फूटी किस्मत) ऐसा हुआ कि वो माँग ही नहीं मानी गयी। अब बाबा जी चाहें जो तर्क-तथ्य बताएँ, सच तो यह है कि यही कुछ माँगें ऐसी थीं जिन पर सहमति नहीं बन सकी और उनकी पूरी योजना धूमिल हो गयी।
अब अन्ना हजारे के आन्दोलन के दौरान जब सबको एक होना चाहिये था, तो बाबा रामदेव के समर्थक अलग-थलग रहे। और ज्यों-ज्यों अन्ना हजारे का आन्दोलन देशव्यापी विस्तार करने लगा, उनके सीने पर जैसे बर्छियाँ चलने लगीं, जो आन्दोलन की सफलता के साथ-साथ तेज़ प्रहार करने लगीं. इस दौरान उन्होंने नये-नये आरोप लगाए और ‘सोनिया-राहुल कॉँग्रेस’ के अनुषांगिक संगठन की भूमिका निभायी। अपने आरोप लगाने के काम के लिए अब उन्होंने नया तथ्य सोच लिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कंधे पर रखकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अन्ना के आन्दोलन को सफल कराकर कॉँग्रेस दरअसल संघ और भारतीय जनता पार्टी का नुक्सान करना चाहती है। कितना हास्यास्पद आरोप जड़ दिया बाबा जी के कट्टर समर्थकों ने! उन्होंने तो इतना सोच लिया, जितना कुप्पहल्ली सीतारामैया सुदर्शन और मोहन राव भागवत जैसे संघ के बौद्धिक लोगों ने भी नहीं सोचा था। असल में यहाँ बात केवल ईगो की थी। रामदेव समर्थकों के हिसाब से देश में अच्छे काम का ठेका केवल बाबा जी के पास होना चाहिये, फिर अन्ना कैसे एक अच्छा काम कर सकते हैं। उनका कहना था कि अन्ना ने रामदेव को मंच पर बैठाने से मना कर दिया। देखा जाये तो इसमें ग़लत क्या है? रामदेव समर्थन के लिए सामने आते, कोई मनाही नहीं थी। लेकिन अगर एक जन आन्दोलन को राजनीतिक रंग देने से रोकने के लिए ऐसा फ़ैसला किया गया तो इसमें क्या बुराई थी? फिर उन्होंने इल्ज़ाम लगा दिया कि अन्ना के आन्दोलन के लिए कुछ कॉँग्रेस नेताओं ने भी चंदा दिया, जिसका ब्यौरा ख़ुद उनके संगठन ने सूची में दिया है. इस हास्यास्पद आरोप पर केवल इतना कहना है कि ये तो टीम अन्ना की सत्यता है कि उसने सब बातें सार्वजानिक रखीं। और फिर कॉँग्रेस नेताओं ने भी चंदा दिया तो इसमें क्या आफत आ गयी? क्या वो पहले इंसान नहीं हैं, या फिर भ्रष्टाचार उनको अच्छा लग रहा है? ऐसे चिंतकों से केवल इतना कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत संघ की संस्था विद्या भारती है, जो शिशु मंदिर विद्यालयों का संचालन करती है। शिशु मंदिरों के लिए सिंधिया परिवार ने कितना योगदान दिया है, यह जगजाहिर है। आज भी कुछ शिशु मंदिरों में विजया राजे सिंधिया व माधव राव सिंधिया की फ़ोटो सम्मान के साथ लगी मिल जाएगी तो क्या माधव राव संघी हो गये थे या शिशु मंदिर कॉँग्रेस की संपत्ति हो गये?
कहा जाता है कि “आरम्भे समाप्ये शनि भौम वारे”, अर्थात ऎसी मान्यता है कि किसी भी नये काम का आरम्भ शनिवार अथवा मंगलवार को करना चाहिये, कार्य शुभ होता है। संयोग से बाबा रामदेव और अन्ना हजारे ने भी अपने अनशन क्रमशः ४ जून (शनिवार) और १६ अगस्त (मंगलवार) को शुरू किये थे। इनमें अन्ना हजारे का आदोलन तो काफ़ी हद तक कामयाब कहा जा सकता है, लेकिन बाबा रामदेव का आन्दोलन निष्फल और अपमानदायक रहा। दरअसल धार्मिक मान्यता है कि शनिवार शनिदेव का दिन होता है और शनिदेव न्याय के सिंहासन पर आसीन हैं तथा लोगों को उनके कर्मों का फल देते हैं। बाबा जी ने शनिवार को अपना आन्दोलन शुरू किया। साधु भेषधारी व्यक्ति के मन में ऐसी कुटिल योजना देख शनिदेव ने त्वरित न्याय करते हुए दंड दिया और बाबा जी का आन्दोलन पहले तो रामलीला मैदान पर चौपट हुआ, फिर बाद में बाबा जी द्वारा हार मानकर अनशन तोड़ देने से वो असफल भी हो गया। फिलहाल यह लेख बाबा जी के अन्ना विरोधी समर्थकों को बुरा ज़रूर लगेगा, लेकिन ज़रा सा भी इस नज़रिये से देखने पर स्पष्ट है कि काले धन को लेकर आन्दोलन की आड़ में बाबा जी की वास्तविक योजना क्या थी। हाँ, अब एक सवाल का जवाब वो अवश्य दे दें, कि अगर कतिपय स्पष्ट बातों के आधार पर वो अन्ना हजारे को कॉंग्रेसी कैसे साबित कर सकते हैं, जब कि इससे कई हज़ार गुना सबूत तो बाबा रामदेव के कॉंग्रेसी होने के हैं?

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32 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra के द्वारा
September 13, 2011

अत्यंत घटिया ब्लॉग है ये आपका…. बेहतर हो की आप पहले बाबा के आन्दोलन के बारे में जाने इसके लिए आप इस सदी के महानायक श्री राजीव दीक्षित जी की वेबसाइट के सभी ऑडियो और वीडिओ व्याख्यानों को डाउनलोड करके सुने… http://www.rajivdixit.com.. माना की इस देश में आज एक लोकपाल जैसे संस्था की भी जरूरत है लेकिन वो काफी नहीं…देश की तकदीर और तस्वीर एक मात्र बाबा रामदेव के आन्दोलन से ही सुधरेगी..

    vikasmehta के द्वारा
    September 13, 2011

    सहमत

    Ajit mohanty के द्वारा
    September 15, 2011

    Nice Blog,jo log kahette hai ki ye ghatia blog hai ek blog lekh kar tto dekhao,oh ramdev rajnit mai uttarna chahati hai,oh bahut bura hai,hamari gaon ki sab log kehete hai.

    surendra के द्वारा
    September 22, 2011

    बाबा अगर राजनीती में उतरना ही चाहते है तो इसमें बुराई क्या है, क्या राजनीती सिर्फ चोर लुटेरो और खुछ खानदानो की जागीर बन कर रह गयी है…?? अगर किसी गटर को साफ़ करना है तो गटर में उतरना ही पड़ेगा, वरना शोर शराबे का आलावा कुछ नहीं होगा, और जनता के हाथ में आएगा सिर्फ झुनझुना …. में भी अन्ना के लोकपाल का समर्थन करता हूँ, लेकिन मुझे पता है की अन्ना कुछ नहीं करा पाएंगे, यूं तो वो पिछले २०-२५ साल से महारास्त्र में आन्दोलन कर रहे है लेकिन महारात्र को उससे मिला क्या..??? आज भी वहां देश के सबसे बड़े भ्रस्ताचारी रहते है, माफिया सरगना और हर तरह के काले धंधे आज भी वह सबसे ज्यादा होते है, भूख के मारे रोज किसान वहा आत्महत्या करते है….. तो फिर अन्ना इतने सालो वह कौन से लडाई लड़ रहे थे वहां …और क्या दिला दिया उन्होंने वहां के लोगो को………..अन्ना का इस्तेमाल सिर्फ कुछ लोग (और राजनीतिक दल) अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए करते आये है, क्योंकि अन्ना खुद तो कभी राजनीती में आयेंगे नहीं किन्तु उनके लिए राजनीती का रास्ता जरूर साफ़ करा देंगे……….. और फिर देश के हाथ कुछ नहीं आएगा, समझौतों के साथ मामला शांत हो जायेगा, एक और गाँधी का नाम इतिहास में दर्ज हो जायेगा, और देश फिर से किसी “गाँधी” की तलाश में जुट जायेगा…. अतः देश को आज गाँधी नहीं सुभाष चाहिए…. जय हिंद…जय भारत…

kshitij के द्वारा
September 12, 2011

इस ब्लॉग के लिए तुम्हे शुभकामनाएं… अच्छा लिखा है…

Rajesh Verma के द्वारा
September 12, 2011

आपका भी पढ़ा और आपके प्रतिक्रिया देने वालों के भी विचार जाने , मुझे लगता है कहीं न कहीं देश को गर्त में धकेलने का काम कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों तथा जातीय भेदभाव की मानसिकता से ग्रषित लोगों का हाँथ रहा है वर्ना ऐसा लिख कर यह सन्देश देने की कोशिश कोई लेखक न करता की हम ही आपस में बटें हुए है , अन्ना व बाबा के पीछे भी उनका अपना परिवार है , पर दोनों के पास कहने को अपना कुछ नहीं है , दोनों का खाने पीने का व रहने का तरीका एक है , दोनों अपने तरीके से देश की सेवा कर रहे हैं , दोनों का मकशद एक है स्वक्ष समाज , हर प्रकार से रोगमुक्त, भ्रस्टाचार मुक्त समाज पर …………आप क्या सन्देश देना चाहते हैं आप देश हित के लिए एक परिपक्व लेखक या Jr. Sub एडिटर हो ही नहीं सकते …….धन्यवाद

mohit के द्वारा
September 12, 2011

achha hi..shukla ji.. lakin baba ram dev pr sani ka kahar jaisa ..katach padne ko nahi mila.. aap ne anna ki to polish kar di.. lakin sirf ek tarfa..matlab mei ye kahna chahta hu ki anna agar bhrastachaar samapt kar ne ke liye baite the to mango tak hi kyo simit ho gaye… wahi dusri taraf baba ramdev unhone kale dhan ki vapsi ke liye agar kuch kaha or kuch unhe hasil nahi hua to kya hua? hr achhe kaam ke liye sabko tareef mile ye jaroori nahi hai..or rahi sani drasti ki baat to sani jo bhi karte hi bhale ke liye hi karte hi..is drasti se bhagvan shiv , indra nahi bache to aam insaan kya bachega…or aap kah rahe hi ki unhone anna ka virodh kiya…agar aisa hota to vo unke sath kyo aaye..? baki or bhi bahoot se prasn hi inka jawab dijiye phir kuch or prasn puchooga… ek anjaan balak

chandan mishra के द्वारा
September 11, 2011

bloger of the week banne par dhero shubhkamnayein dost…… mai is vishye par koi comment dena nhi chaunga.. kyunki sab ek hi thali ke chatte batte hain… aapki lekhan shakti dino din nikharti ja rhi hai aap satya ko saamne late huye har vishyavastu par bhi lekh prakshit karein…. dahnyvaad evam shubhkamnayen..

vikasmehta के द्वारा
September 11, 2011

सचिन शुक्ल जी किसलिए आप एक भगवाधारी राष्ट्रभक्त को बदनाम करने पर तुले हुए है .मुझे लगता है आप अन्ना की अंधभक्ति में लीन होकर बहक गये है .पहले आप बाबा जी के प्रयासों को देखिये फिर बाद में अन्न जी और रामदेव के अन्तरो को तलाशियेगा वर्ना ये उतपतंग मत ही लिखिए . यह आपकी सस्ती लोकप्रियता है vikasmehta.jagranjunction.com

Dr S Shankar Singh के द्वारा
September 11, 2011

आपकी समस्या बाबा रामदेव को लेकर है. आपने सरकार के व्यवहार को अनदेखा किया है. पहले तो तीन कैबिनेट मंत्रियों द्वारा एअरपोर्ट जाकर बाबा को राष्ट्राध्यक्षों जैसा सम्मान दिया, फिर उनकी सारी मांगें मानने का आश्वासन देकर उनसे आन्दोलन वापस लेने के बारे में लिखित अंडरटेकिंग ले लिया गया. अर्धरात्रि को जलियांवाला बाग़ शैली में सोते हुए लोगों को पिटवा दिया. किसी भी सरकार द्वारा ऐसा धोखा धडी का व्यवहार न देखा न सुना गया है. क्या सरकार नें अपने को कठघरे में खड़ा नहीं कर लिया है. सरकार की विश्वसनीयता क्या रही. कौन उसके आश्वासनों पर विश्वास करेगा. अपने व्यवहार से सरकार नें अपने को गौरवान्वित नहीं किया है. क्या सरकार को ऐसा ही होना चाहिए. क्या आप इस बात की गारंटी देंगे कि अनशन तुडवाने के बाद ऐसी ही धोखा धडी अन्ना के साथ नहीं कि जायेगी. बाबा रामदेव और अन्ना में प्रतिद्वंदिता किधर है. आपका क्या विचार है.

vijay pandey के द्वारा
September 11, 2011

bahut hi sarthak lekhan ……shabdon ka pryog chun chun ke , is se lekhak kitna samvedan sheel hai aur doordarshi ,…..ye pata chalta hai ……meri subhkamnayen aapar hai lekhak ke prati ……ant main itna hi kahna chaunga …..honhhar virwan ke hot hai chikne paat …….keep it up

Santosh Kumar के द्वारा
September 10, 2011

सचिन जी ,.सादर अभिवादन ब्लागर ऑफ़ वीक बनने पर हार्दिक बधाई ,…..बस एक बात जरूर कहना चाहता हूँ ,….शनिदेव सदैव सिखाते हैं ..जिसको नहीं सिखाते उसको बर्बाद कर देते हैं ,…….अहंकार जिसको भी आएगा उसे जरूर औकात दिखाते हैं ,…..टीम अन्ना ने जिस तरह लालीपाप देख जश्न मनाया वो क्या था ???? ……. एक पौधा सूखने की कगार पर है ,…स्वाद पूरे बगीचे का बता रहे हैं ,…मैं न तो बाबा समर्थक हूँ और ना ही अन्ना विरोधी ,..वस्तुतः मैं दोनों का समर्थक हूँ …..और आपने यह शोध कहाँ कर लिया कि अन्ना आन्दोलन से बाबा समर्थक दूर रहे ,..दिल्ली के बाहर आन्दोलन को जोर पकड़ने में बाबा के समर्थको ने जी जान लगा दी ,…बाकी काम मीडिया ने कर दिया ,..लेकिन सवाल सरकार की नीयत पर गहरा गए हैं ,….क्योंकि बाबा कालाधन मांग रहे थे ,.अतः कांग्रेस आलाकमान उनसे ज्यादा परेशान था ,…चलो अभी देखते हैं क्या होगा ……यदि बाबा और अन्ना कभी आमने सामने हुए तो हार सिर्फ और सिर्फ भारतवर्ष की जनता की होगी ,……साभार

    vikasmehta के द्वारा
    September 11, 2011

    संतोष कुमार जी आप बिलकुल सही कह रहे है

omprakash pareek के द्वारा
September 9, 2011

शुक्लाजी, आपका विशद विश्लेषण काबिले तारीफ है. राजनीती से हट कर सिर्फ बाबा के मनोविज्ञान के लिहाज से सोचें तो उन्हें लगा की स्विस बैंकों वाला मुद्दा, जो उन्हों ने पुरजोर उठाया था , के लए जो एक्सपोजर और मीडिया की लायिम लाईट तो जंतर मंतर वाले बाबा (अन्ना) मार ले गए तो अब खुद कुछ ऐसा करें की हम एक सीढ़ी ऊपर दिखाई दें; सो इस हालत में सीढ़ी तो चढ़ गए पर धडाम से गिर कर पुलिस के साथ (समर्थकों को पिटता छोड़)भाग निकले., वरना मुद्दा तो दोनों (अन्ना और बाबा) का वस्तुतः एक ही था . बैंकों में भी तो भ्रष्टाचार की ही कमाई जमा है. बाबा अन्ना के मंच से भी अपना उद्देश्य हासिल कर सकते थे पर उनकी दाढ़ी में तिनका था. यह बात देशवासी जान गए हैं की अन्ना का ना तो कंग्रेस्सियों और ना ही भाजपाइयों से कोई प्रत्यक्ष या अ-प्रत्यक्ष सांठ-गाँठ है और वे एक अछे साफगोई वाले चरित्र के व्यक्ति है. जनता ने इसी वजह से अन्ना का पूरा पूरा साथ दिया और वे शक्तिशाली ढंग से रास्ट्रीय मंच परे ‘हीरो’ बन कर उभरे. मेरे मंतव्य पर आपकी टिपण्णी चाहूँगा, अगर हो सके तो. http://www.oppareek43.jagranjunction.com

Ramesh Nigam के द्वारा
September 9, 2011

DESH BANTA, PAKISTAN ROOPI DARINDE KA JANM HUAA JO SURAKCHHAA PAR ROZ KARORON BARBAD KARWA RAHA HAI, LAKHON LUTE PITE BEAABRU HUE BHAGE SHARNARTHI BANE AUR NEHRU BANE PRADHAN MANTRI JINHONNE KASHMIR KA NAASUR BANAAYA APNEE PREYASEE EDWINA KE CHAKKAR MEN, TIBBET KO BHENDIYE KE MUNH MEN JHONK DIYA, APNEE HAZARON KILOMEETER BHOOMI GANWAAYEE TATHAA ANGINIT SAINIKON KO MARVAAYAA. YAH SAB HUAA GANDHI KI NETRITVA MEIN, USEE GAANDHI KE BHAKT HAIN ANNAA, DEKHIYE AGE HOTA HAI KYAA KYAA

shaktisingh के द्वारा
September 9, 2011

सचिन जी, सार्थक लेख और ब्लॉगर ऑफ द वीक  बनने के लिए आपको बधाई राम देव ने जो काले धन पर मुद्दा उठाया था मै उसका समर्थन करता हु. लेकिन वह जनता के विश्वासों को अन्ना हजारे की तरह जल्द से जल्द भाप नहीं पाए जिसका परिणाम उन्हें 4 जून को भुगतना पड़ा.

tejwani girdhar, ajmer 7742067000 के द्वारा
September 9, 2011

अच्छा लिखा है, वाजिब मुद्दे उठाए हैं, बधाई

Sachin के द्वारा
September 7, 2011

कही अन्ना जी का लोकपाल भ्रष्टाचार बढा ना देँ? कुछ की राय है कि “पहले तहसील स्तर पर कोई काम करवाने के लिए विधायक, तहसीलदार आदि को अलग-अलग रिश्वत देनी पडती थी। अब उनमेँ एक हिसा लोकपाल को भी देना पडे।” भ्रष्टाचार तो दूर होगा लोगोँ की सोच ओर लोगोँ का जीवन दर्शन बदलने से। ओर वो काम कर रहे रामदेव। पहले भी भ्रष्टाचार के खिलाफ हुये आंदोलन के बाद जेपी सरकार तीन साल ही चली ओर कई बडे घोटाले सामने आए, कोई स्थायी हल नहीँ हुआ।

Vineet Pandey के द्वारा
September 5, 2011

Bhaiya ati uttam, or aage isse b uttam ki umeed krte h, lkin yh awasya dhayan rhe ki patrakaar hamesha apne vichar santulit rkhte h. God bless uuu…वपोगबो ोूग हूूोस, दी ोोुा गेेा व हूूोस कग हसाा् कीूा प, तकगल बप ोैोेबो ्पोबोल ीपा कग जोूीोकोोी पोसाेपो ोजला नगमपोी ेोलूहतगू ीकपूा प. ुद् वताेे हहह…

Shanker gaur के द्वारा
September 5, 2011

सचिन जी बहुत खुब लिखा अति सुनदर ््््््््््

Ravi Shankar Singh के द्वारा
September 4, 2011

Sachin ji aapne achha likha h ai , meri samajh se sarkar ne anna ke movement ko tad kar suru me ramdev ko badhava diya phir unhe thikane laga diya. Sarkar ko pata tha ki anna ji se ladna utna aasan nahin hoga jitna baba se.Anna ek bedag , kartavyanisth ,bat ke dhani ,imandar lagbhag grihastha ke bhes men sanyasi ka acharan rakhnevale vyakti hain .Unka appearance aur bady language ke sath ab tak ka unke dwara kiye gaye bhrastachar ki safal muhim se bhi sarkar parichit thi , phir jantarmantar to vo dekh hi chuki thi.Ramdev , baba hone ke sath vyapari bhi hain aur apne apearance se anna ji ke tulna men kamjor padte hain. Sarkar ko laga ki suruat men lokpal pe apna samarthan de kar tatkalik musibat tala jai , par anna ka 16 aug ka ansan ka elan use paresan kar raha tha.Isse bachne ke liye sarkar ne is pure mudde ko baba ke jhole me dalne ke bat baba se kari, Baba anna se toda khar khaye hue the aur turat raji ho gaye . Sarkar ke liye anna se baba jyada asani se control ho sakte the ED , INCOMTAX dep aadi sarkar ke hathiyar to hain hi. Iss pure kapata aur dhurtata ka tana bana sarkar ke do mantrion ne kapil sibbal aur chidambaram me banaya aur usse pura bhi kiya . Par ye chal kapat sarkar ko ulta pad gaya (jo jayaz bhi tha).Janta baba ke andolan se bhi naraz thi aur pura bhadas anna ke samarthan ke sath bahar aaya. Sarkar jo apne dayitvon ko pura nahin karti rahi aur galti pe galti karti rahi . Is sab ka ant to jahir hai sab ke samne. Aapne kaha kaun congressy hai to mera man na hai baba ramdev ki puri harkat congress se mel khati hue dikhai deti hai aur anna ek jan nayak ke taur par ubharen hain , jinki ek aawaz par kabhi bhi lakhon log sadak pad utar kar sarkar se jo bacha adha karya hai use pura karva sakti hai. Main vyaktigat rup se jab se chezoon ko samajhne ki umra me pahuncha , tab se vyavastha parivartan kolekar sochta raha aur dhere dhere nirash hota ja raha tha. Mujh jaise lakhon logon ke liye anna ke rup men ek aadarsh bhi mile aur ek naye samaj ki kalpana bhi sakar hoti dikh rahi hai.

Priya के द्वारा
September 4, 2011

Bahoot khub likha aapne….nice.

Kandarp Thakur के द्वारा
September 4, 2011

BAHUT HI YATHARTHPARAK VISHLESHAN..SACHIN JI CONGRATS

dayadhar sharma के द्वारा
September 4, 2011

मैं कोई राम देव का समर्थक तो नहीं पर, क्यों की जनरल डिब्बे का ब्लॉग है सो इस तथ्यों से परे विश्लेषण का क्या महत्व,,,,,,,,,,जिसकी जो मर्जी लिखने के लिए स्वतंत्र है…….

vijay anna के द्वारा
September 4, 2011

सबसे पहले तो congratulations.. for diz beautiful blog to sachin shukla…/yeh sarkar apni aadato se baaz nahi aa rahi hai…hum deshwasiyon ko yeh bhrashtachari rajneeti aur rajnetaon ko khatam karke ek swatantra bharat banana hai…so plz wakeup all indians ….sarkar aur polticians ki yeh gandi rajneeti ka khel khatam karne ke liye aage bado….aur jang ki tarah unpar prahar karo…..jai hind

Rah Shukla के द्वारा
September 3, 2011

भैया बतकहिया तव तोहारव बहुत नीक लगत अहै मुला पूरा उपन्यास लिखी देहे अहेव. सभी एतना लम्बा चौड़ा पढि न पाए. थोरिक जादा टेम निकारय का परे….

shiv ram dass gupta के द्वारा
September 3, 2011

बहुत परिश्रम से विचार विमोचन किया गया है. जन जागरण आवश्यक है. जन नेता का समर्थन शक्ति है. शेष राजनीति है. लिखते रहिये. नव क्रान्ति के इस समय में लेख समयानुसार है. सूचना समृद्ध कर मानस उद्वेलन करता है. लेखक को लेखन के लिए बधाई.

Dr. Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
September 3, 2011

अच्छा विश्लेषण सचिन जी, बाबा रामदेव के संपूर्ण आंदोलन का अध्ययन परिलक्षित हो रहा है। बधाई… ऐसे ही लिखते रहिए

राजू मिश्र के द्वारा
September 2, 2011

बात तौन सही कहि रहे हौ लल्‍ला…पै मुलुक मा बड़ा दंद-फंद है, का करी अन्‍ना…हुई जई ताता धिन्‍ना या तौ। लिखे रहौ बस डटिकै। जय हो।

सुनीता के द्वारा
September 2, 2011

चाहे अन्ना जीते या मनमोहन फायदा सच को होना चाहिए. भ्रष्टाचार को किसी भी किमत पर खत्म होना ही चाहिए.

    vijay anna के द्वारा
    September 4, 2011

    सबसे पहले तो congratulations.. for diz beautiful blog to sachin shukla…/yeh sarkar apni aadato se baaz nahi aa rahi hai…hum deshwasiyon ko yeh bhrashtachari rajneeti aur rajnetaon ko khatam karke ek swatantra bharat banana hai…so plz wakeup all indians ….sarkar aur polticians ki yeh gandi rajneeti ka khel khatam karne ke liye aage bado….aur jang ki tarah unpar prahar karo…..jai hind


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